प्राणायाम कैसे करें | Pranayama Yoga Benefits in Hindi

प्राणायाम(Pranayama Yoga Benefits in Hindi) का स्थान योग आसान के बाद आता है। प्राणायाम और योगासन का बहुत लाभ है। ये कैसे किया जाता है और प्राणायाम के भेद क्या है। इसको करने के लिए कुछ नियम भी है। तो यहाँ प्राणायाम से जुडी सारी जानकारी अच्छे से दी गई है।

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प्राणायाम क्या है ? Pranayama Yoga in Hindi

बहुत से लोग प्राण का अर्थ श्वास या वायु लगाते हैं और प्राणायाम का अर्थ श्वास का व्यायाम बताते हैं, किन्तु यह धारणा गलत और भ्रामक है क्योंकि प्राण वह शक्ति है, जो वायु में क्या विश्व के समस्त सजीव और निर्जीब पदार्थों में व्याप्त है । निस्संदेह इसका “संबंध श्वास द्वारा ली जाने वाली वायु से भी है, किंतु यह वायु मात्र नहीं है, बल्कि उसके अंतर में निहित प्राण शक्ति (vital power) है । इसीलिए जब किसी की मृत्यु होती है, तो हम कहते हैं कि इसके प्राण-पखेरू उड़ गये। वायु और उसमें अंतर्निहित प्राण की इस भिन्नता को हमें प्राणायाम के प्रसंग में ध्यान में रखना चाहिए।

प्राणायाम के कुछ आवश्यक नियम और निर्देश

इस दृष्टि से प्राणायाम का शाब्दिक अर्थ हुआ प्राण का आयाम यानि विस्तार करना। इसका उद्देश्य शरीर में व्याप्त प्राण शक्ति को उत्प्रेरित, संचारित, नियंत्रित और संतुलित करना है । इससे हमारा शरीर तथा मन नियंत्रण में आ जाता है। हमारे निर्णय करने की शक्ति बढ़ जाती है और हम सही निर्णय करने की स्थिति में आ जाते हैं।

शरीर की शुद्धि के लिए जैसे स्नान की आवश्यकता है, वैसे ही मन की शुद्धि के लिए प्राणायाम की | इससे हम स्वस्थ और निरोग होते हैं, दीर्घायु प्राप्त करते हैं, हमारी काम शक्ति बढ़ती है और मस्तिष्क के रोग दूर होते हैं । हमारे आमाशय, लिवर, वृक,छोटी-बड़ी आंतें तथा पाचन संस्थान के सारे अंग प्रभावित होते हैं जो हमें कार्यकुशल बनाते हैं ।

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प्राणायाम से नाड़ियां शुद्ध होती हैं, हमारे स्नायुमंडल (nervous system) को शक्ति मिलती है, मन की चंचलंता दूर होती है, मन एकाग्र होता है और इससे मन था इंद्रियों पर विजय प्राप्त करने में सहायता मिलती है।

व्यास भाष्य में कहा गया है — “तपो न परं प्राणायामात्‌ ततो विशुद्धिर्मलानां’, अर्थात्‌ प्राणायाम से बढ़कर कोई तप नहीं । इससे मल धुल जाते हैं और ज्ञान का उदय होता है।

इस संदर्भ में मनु का कहना है,

दह्ांते ध्यायमानानां धातूनां हि यथा मला:।
तथेंद्रियाणां दह्मंते दोषा: प्राणस्य निग्रहातू ॥

“जैसे अग्नि से धौंके हुए स्वर्ण आदि धातुओं के मल नष्ट हो जाते हैं, उसी प्रकार प्राणायाम करने से इंद्रियों के मल नष्ट होते हैं।”

इंस उपरोक्त संदर्भ में ही ऋग्वेद के ये दो मंत्र भी ध्यान देने योग्य हैं:

द्वाविमौ वाताौ वात आ सिंधोरापरावत:।
दक्ष ते अन्य आं वातु परान्यो वातु यद्रप: ॥
आ वात वाहि भेषजं विवात वाहि यद्गप:।
त्वं हि विश्व-भेषजों देवानां इत ईयसे।

(ऋग्वेद 10.137.2 और 3)

अर्थ-

“हमारे शरीर में दो प्रकार की, प्राण और अपान नाम की, वायु चल रही हैं । इन दोनों में से एक तो सिंधु अर्थात हृदय तक चलती है और दूसरी बाहर के वायुमंडल तक । हे प्राणायाम के अभ्यासी मनुष्य, उनमें से एक-प्राण वायु तो तेरे अंदर आरोग्य, बल, उत्साह और जीवन शक्ति को ले आवे और दूसरी-अपान वायु जो भीतर के निर्बलता और रोगों को शरीर से परे अर्थात बाहर ले जाये।”

हे प्राण वायु, तू हमारे अंदर रोगों को नष्ट करने वाली शक्ति को ले आ और हे अपान वायु, तू जो हमारे अंदर खराबियां अर्थात्‌ अनेक प्रकार के रोग और निर्बलताएं हैं, उन्हें बाहर ले जा; क्योंकि, हे प्राणशक्ति, तू अवश्य संसार भर के संपूर्ण रोगों की अचूक औषधि है, और तू देवताओं अर्थात्‌ दिव्य शक्तियों का दूत बनकर हमारे अंदर चल रही है।’

इन मंत्रों में ऋषियों ने प्राणशक्ति को देवताओं का दूत और दिव्य शक्तियों को | ले जाने वाला बताया है।

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पंच प्राण- Pranayama in Hindi

यद्यपि प्राण एक है, पर मानव शरीर में स्थान विशेष पर उनकी स्थिति और प्रभाव के आधार पर इसे पांच उपभागों में बांटा जाता है। इन पांचों उपभागों को सामूहिक रूप से पंच प्राण कहा जाता, जो इस प्रकार हैं:-

प्राण

यह कंठ से हृदय तक व्याप्त है। यह प्राण शक्ति सांस को नीचे खींचने में सहायक होती है।

अपान

यह मूलाधार-चक्र के पास स्थित है। यह वायु बड़ी आंत को बल देती है और मल-मूत्र के निष्कासन में सहायक होती है।

समान

नाभि से हृदय तक रहने वाली वायु को समान कहते हैं । यह प्राण शक्ति पाचन संस्थान तथा उनसे निकलने वाले रसों को उत्प्रेरित और नियंत्रितों करती है।

उदान

कंठ से मस्तिष्क तक रहने वाली वायु को उदान कहते हैं। इस प्राण शक्ति द्वारा कंठ के ऊपर के अंगों-आंख, कान, नाक, मस्तिष्क आदि का नियंत्रण होता है । इसके अभाव में हमारा मस्तिष्क ठीक से काम नहीं कर पाता और बाह्य जगत के प्रति हमारी चेतनानष्ट हो जाती है।

व्यान

यह वह प्राण शक्ति है, जो संपूर्ण शरीर में व्याप्त है। इसका मुख्य स्थान स्वाधिष्ठान-चक्र है । यह शरीर की अन्य शक्तियों और प्राण वायु में सहयोग स्थापित करती है और सारे शरीर की गतिविधियों का नियमन और नियंत्रण करती है।

प्राणायाम की कुछ आवश्यक बातें हमें समझ लेनी चाहिए। हम नाक के बायें और दायें छिद्रों द्वारा श्वास-प्रश्वास की क्रियाएं करते हैं । यह क्रिया दो मार्गों के द्वारा होती है। दाहिने नथुने का प्राणप्रवाह सूर्यनाड़ी द्वारा और बायें नथुने का प्राणप्रवाह चंद्रनाड़ी द्वारा होता है। ये दोनों प्राणप्रवाह अंदर मिलकर जो तीसरा प्राण बनाते हैं, जो कि दोनों नथुनों से प्रवाहित होता है, उसे सुषुम्ना नाड़ी कहते हैं।

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बंध

इस प्रकरण में तीन बंधों का वर्णन है;

1.जालंधर बंध- जालंधर बंध छाती को ऊपर उठाते हुए ठोड़ी को कंठकूप में दबाने से लगता है।

2.उड्डियान बंध-  उड्डियान बंध श्वास को बाहर निकाल कर पेट को अंदर मेरुदंड की ओर खींचने से लगता है।

3. मूलबंध -मूल बंध गुदा को ऊपर की ओर खींचकर आकुंचन करने से लगता है।

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नाड़ियां

हमारे शरीर में ये तीन महत्वपूर्ण नाड़ियां हैं–

1. इड़ा या चंद्र नाड़ी

यह ठंडी नाड़ी है और शरीर के बायें भाग का और। के विचारों का नियंत्रण करती है। यह तमोगुण प्रधान है।

2, पिंगला या सूर्य नाड़ी

यह शरीर के दायें भाग का नियंत्रण करती है, शरीर को गर्मी देती है तथा मानव में प्राणशक्ति का नियंत्रण करती है। यह रजोगुण प्रधान है।

3. सुघुम्ना नाड़ी

यह मध्य नाड़ी है। यह मेरुदंड में स्थित है और विशुद्धिचक्र से मूलाधारचक्र तक जाती है। इसमें से 3। जोड़े नाड़ियां निकलती हैं, जिनकी शाखाएं तथा उपशाखाएं शरीर के हर भाग तक जाती हैं जो कि सारे शरीर का नियंत्रण करती हैं |

यह नाड़ी न गर्म है और न ठंडी बल्कि दोनों के संतुलन में सहायक है तथा प्रकाश व ज्ञान देती है। इसको सरस्वती और शांति नाड़ी भी कहते हैं। यह सत्व प्रधान है। इसको आप ऐसे समझें जैसे घर में बिजली का प्रकाश लाने के लिए एक गर्म तार, एक ठंडी तार और अर्थ (Earth) की आवश्यकता होती है ।

बिजली बिना कोई हानि पहुंचाए हमारे घर की सारी आवश्यकता हमारी इच्छानुसार पूरी करे, इसके लिए हमें घर में सर्किट बनाने पड़ते हैं,
बटन लगाने पड़ते हैं, अर्थ (Earth) लगानी पड़ती है । थोड़ी-सी भी गलत व्यवस्था बहुत बड़ी हानि पहुंचा सकती है। इसी प्रकार इड़ा, पिंगला तथा सुषुम्ना को समझना चाहिए। तीनों का संतुलन ठीक होने से ही आप अपने शरीर को स्वस्थ रख सकते हैं, मन को शांत रख सकते हैं। अपने काम को सही दिशा में करने की शक्ति प्राप्त कर सकते हैं।

प्राणायाम का उद्देश्य इड़ा तथा पिंगला में ठीक संतुलन करके सुषुम्ना के द्वारा प्रकाश तथा ज्ञान प्राप्त कराकर आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त केरना है। शारीरिक दृष्टि से प्राणायाम इन तीनों नाड़ियों में ठीक-ठीक संतुलन करके आरोग्य, बल, शांति तथा लंबी आयु प्रदान करता है।

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प्राणायाम कैसे करें- Pranayama Yoga in Hindi

स्थान

प्राणायाम का स्थान समतल, शुद्ध, शांत व हवादार होना चाहिए। अच्छा हो यदि किसी बगीचे में आसन बिछाकर इसको किया जाए। जहां सीधी, तेज हवा तथा अशुद्ध वायु हो वहां प्राणायाम नहीं करना चाहिए । तेज पंखे के नीचे प्राणायाम न करें । भीड़ भाड़ वाली जगह भी इसको न करें।

समय

प्राणायाम के अभ्यास का सबसे अच्छा समय प्रातःकाल की ब्रह्मवेला है, क्योंकि उस समय वायुमंडल शांत होता है, गर्दोगुबार नहीं होता और वायु में ऑक्सीजन की मात्रा अधिक होती है । प्रात: शरीर शुद्धि के बाद निश्चित आसन पंर बैठकर प्राणायाम का अभ्यास करना चाहिए शुरू में 5-0 मिनट अभ्यास करें, फिर धीरे-धीरे समय बढ़ाकर आधा घंटा भी कर सकते हैं । पर जितने समय भी करें, अपनी सुविधानुसार निश्चित करके ही करें, क्योंकि कभी कम कभी अधिक देर तक इसको करना ठीक नहीं है।

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आसन मुद्रा

अधिकतर सभी प्रकार के प्राणायाम सिद्धासन या पद्मासन में बैठकर, शरीर को बिल्कुल सीधा रखकर तथा तनावरहित सहज व सुखदायक स्थिति में करने चाहिए । इसीलिए इसके इच्छुक को पहले अपने शरीर तथा मन की तैयारी आसनों अभ्यास द्वारा कर लेनी चाहिए। इसके अतिरिक्त षट्‌क्रियाओं द्वारा शरीर की शुद्धि भी कर लेनी चाहिए, शरीर के किसी हिस्से में तनाव भी नहीं रहना चाहिए, दोनों हाथ दोनों घुटनों पर ज्ञानमुद्रा की स्थिति में रखने चाहिए, आंखें हल्की मुंदी रहें।

प्राणायाम प्रारंभ करने से पहले थोड़ी देर स्वास को स्वाभाविक रूप से लेकेर सम शांत करें । शरीर को ढीला कर लें तथा चारों तरफ से विचारों को हटाकर मन को एकाग्र कर लें।

प्राणायाम केवल साधारण श्वास लेने और छोड़ने की क्रिया नहीं है । प्राणायाम करते हुए अपना ध्यान पूर्ण रूप से श्वास पर रखना चाहिए। इसको करते समय श्वास लेने बर छोड़ने की गति बड़ी धीमी तथा नियंत्रित रहनी चाहिए । प्राणायाम शक्ति के अनुसार ही करना चाहिए, अधिक तथा अनियमित रूप से नहीं । जैसे-जैसे शक्ति तथा अभ्यास बढ़े उसी के अनुसार इसमें आगे बढ़ना चाहिए।

इसको करते समय नाक के दायें-बायें छिद्रों को बंद करने की आवश्यकता होती है।यह काम दाहिने हाथ के अंगूठे तथा अनामिका (अंगूठे की तीसरी अंगुली) द्वारा किया जाता है । पहली और दूसरी अंगुली हथेली की ओर थोड़ी मुड़ी रहेगी । नासिका के छिद्र को बंद करना हो तो अनामिका व अंगूठा इन दोनों का उपयोग करें।

जब प्राणायाम में नाक पकड़ने की आवश्यकता न हो तो दोनों हाथ आराम से घुटनों पर रखें।

प्राणायाम में श्वास की तीन क्रियाएं की जाती हैं

(1) पूरक अर्थात श्वास को अंदर लेना

(2) रेचक अर्थात्‌ श्वास को बाहर निकालना तथा

(3) कुंभक अर्थात्‌ श्वास को अंदर या बाहर रोकना | अंदर श्वास भर कर रोकने को ‘आंतरिक कुंभक’ और श्वास बाहर निकाल कर रोकने को “बाह्य कुंभक‘ कहते हैं।

प्राणायाम के भेद- Pranayama ke Bhed in Hindi

प्राणायाम के प्रकारों को लेकर योग के ग्रंथों में अलग-अलग विचार हैं। इस क्रिया के लगभग 50 प्रकारों का वर्णन ग्रंथों में मिलता है । लेकिन यहां पर अग्निसार, कपालभाति, भस्त्रिका, शीतली, शीतकारी, सूर्य भेदी, उज्जायी, भ्रामरी और नाड़ीशोधन इन 9 प्राणायामों का वर्णन किया जा रहा है।

इनमें से भस्त्रिका और सर्यभेदी प्राणायाम सर्दियों के लिए विशेषतौर पर लाभदायक हैं और शीतली ब चंद्रभेदी ग्रीष्मऋतु में विशेष लाभ देते हैं, जबकि नाड़ीशोधन, उज्जायी, भ्रामरी और कपालभाति को सर्दी-गर्मी दोनों ऋतुओं में किया जा सकता है।

वैसे तो, यदि प्रातःकाल, खाली पेट इसका अभ्यास किया जाए तो वह ज्यादा सही है, पर यदि ऐसा संभव न हो, तो भोजन के 3-4 घंटे बाद ही यह अभ्यास करना चाहिए।

जैसा कि ऊपर निर्देश दिया गया है-कि प्राणायाम शीत और ग्रीष्म ऋतुओं से भी संबंधित हैं, इसलिए इस बात का भी अभ्यास में ध्यान रखें अर्थात्‌ सर्दियों में शीतली व शीतकारी प्राणायाम का अभ्यास न करें और गर्मियों में भस्त्रिका और सूर्यभेदी का । साथ ही, शीतली व शीतकारी प्राणायाम वातप्रकृति वाले साधक को भी नहीं करनां चाहिए।

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अग्निसार प्राणायाम

नाभि-स्थान अग्नि-तत्व का केंद्र है । खाना पचाने में यह सहायक है | खाना पच जाने के पश्चात्‌ उससे निकले हुए द्रव्यों को शरीर के सभी अंगों को यह वितरित-करता है। जठराग्नि मंद पड़ जाने से पाचन क्रिया भलीप्रकार नहीं हो पाती, परिणामस्वरूप शरीर अनेक रोगों से ग्रसित हो जाता है । अत: इस केंद्र को पुष्ट रखना अति आवश्यक है ।

अग्रिसार क्रिया जठराग्नि को ठीक करने का सर्वश्रेष्ठ साधन है । बदहजमी, गैस आदि पेट के अन्य रोगों को दूर करने में भी यह लाभदायक है। मोटापा दूर करने के लिए अग्निसार क्रिया रामबाण है। इससे रक्ताल्पता भी समाप्त होती है।

अग्निसार प्राणायाम करने की विधि

पदमासन में बैठ श्वास को अधिकाधिक बाहर निकालें, रेचक करें, श्वास को बाहर रोककर पेट को आगे-पीछे तब तक करते रहें जब तक श्वास स्वाभाविक रूप से बाहर निकला रहे । पेट को ढीला छोड़ते हुए पूरक करें। इसे दो-तीन बार कर सकते हैं।

विशेष ध्यान: कुंभक शक्ति से अधिक कदापि न करें।

कपालभाति प्राणायाम

कपालभांति तथा भस्त्रिका प्राणायामों में थोड़ा-सा ही अंतर है । कपालभाति में केवल रेचक को जोर लगाकर किया जाता है, जबकि भस्त्रिका में पूरक और रेचक दोनों क्रियाएं जोर लगाकर करनी होती हैं । कपालभाति करते समय अपना ध्यान केवल रेचक क्रिया पर रखना चाहिए।

श्वास जोर से छोड़ते समय पेट एकदम जल्दी से अंदर की ओर जाएगा। कारण, पेट की वायु झटके के साथ बाहर निकलेगी और पूरक करते समय पेट धीरे-धीरे अपनी स्वाभाविक स्थिति में आ जाएगा।

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कपालभाति प्राणायाम करने की विधि

पद्मासन या सिद्धासन, सुखासन या वज्रासन में बैठकर अपने श्वास को शांत करें । फिर पूरे जोर से नासिका द्वारा श्वास को बाहर फेकें, श्वास लेने का प्रयास न करें ।

पहले इस क्रिया को धीरे-धीरे करें फिर थोड़ी गति को बढ़ाकर जल्दी-जल्दी भी कर सकते हैं। ध्यान रखना है कि श्वास को केवल बाहर फेंकना है।

पहले पंद्रह-बीस बार कपालभाति करें, फिर धीरे-धीरे अभ्यास को बढ़ाएं। जितनी बार भी कपालभाति करें, अंत में, बाह्य कुंभक करते हुए मूल, उड्डियान और जालंधर बंध कुछ क्षण के लिए लगा सकते हैं।

पहले पेट को ढीला करते हुए उड्डियान बंध खोलें, तत्पश्चात्‌ जालंधर और मूल बंध खोलें । श्वास स्वाभाविक। ध्यान आज्ञा-चक्र पर। ।

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कपालभाति प्राणायाम करने के लाभ:

कपालभाति से ध्यान की एकाग्रता बढ़ती है, क्योंकि इससे कपाल की नसं- नाडिया होती हैं । जो व्यक्ति ध्यान में बैठते हैं, वे ध्यान में बैठने से पहले कपालभाति करें। इससे इंद्रियां वश में आती हैं और मन शांत होता है। मस्तिष्क की नस-नाड़ियों को तनावमुक्त करने तथा सिर दर्द में यह लाभदायक है।

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भस्त्रिका प्राणायाम

यह बहुत ही महत्वपूर्ण प्राणायाम से । इसके द्वारा शरीर को प्राण-वायु अधिक मात्रा में उपलब्ध करायी जाती है तथा उसी प्रकार अधिक दूषित वायु (कार्बन डाइऑक्साइड) बाहर निकाली जाती है। इससे तेजी से रक्त की शुद्धि होती है तथा शरीर के विभिन्न अंगों रक्त का संचार तेज होता है ।

यह  कुंडलिनी शक्ति को जगाने में बहुत सहायक है। दुर्बल हृदय व रक्तचाप वाले रोगियों को यह प्राणायाम नहीं करना चाहिए।

भस्त्रिका का मतलब है धौंकनी । लोहार की धौंकनी के समान कुछ बलपूर्बक श्वास- प्रश्वास क्रिया को जल्दी-जल्दी करना ही भस्त्रिका प्राणायाम है। भस्त्रिका प्राणायाम में इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना तीनों नाड़ियां प्रभावित होती हैं।

भस्त्रिका प्राणायाम करने की विधि

पद्मासन या सिद्धासन में बैठकर गर्दन व रीढ़ की हड्डी को सीधा रखते हुए शरीर और मन को स्थिर करें। दायें हाथ की दोनों बींच की अंगुलियों से बायीं नासिका को बंद करें। अब बिना शरीर को हिलाये दायीं नासिका से जोर से श्वास लें और ज़ोर से बाहर निकालें | पहले धीरे-धीरे करें, फिर गति को बढ़ाते हुए जल्दी-जल्दी 20 बार करें ।

अंत में पूरा श्वास भरकर दायें अंगूठे से दायीं नासिका को भी बंद कर लें और आंतरिक कुंभक करते हुए मूलबंध, उड्डियानबंध और जालंधर बंध लगायें कुंभक करें। फिर धीरे-धीरे बंधों को खोलते हुए बायीं नासिका से श्वास को बाहर निकाल दें । कुछ विश्राम करें ।

अब दार्यी नासिका को अंगूठे से बंदकर बायीं नासिका से भस्त्रिका करें । 20 बार करने के बाद पूर्ण श्वास को भरकर बायीं नासिका को अंगुलियों से बंद करते हुए आंतरिक कुँभक करें। फिर दायीं नासिका को खोलकर श्वास को बाहर निकाल दें।

श्वास को साधारण कर लें। अब दोनों हाथों को घुटनों पर रखकर दोनों नासिका छिद्रों से भस्त्रिका करें और अंत में श्वास भरकर तीनों बंध लगाते हुए आंतरिक कुंभक करें, फिर श्वास को धीरे से नासिका से निकाल दें।

भस्त्रिका प्राणायाम के अभ्यास को आप धीरे-धीरे बढ़ा सकते हैं | यह ध्यान रहे कि श्वास छोड़ने और लेने की लय बनी रहे और श्वास लेने और छोड़ने का अनुपात एक-सा हो । पूरक व रेचक क्रियाएं समान रूप से, जोर-जोर से व.जल्दी-जल्दी की जाती हैं | प्राणायाम करते हुए नाक के द्वारों पर जोर नहीं पड़ना चाहिए।

भस्त्रिका प्राणायाम में दक्षता प्रात करने के लिए पहले बहुत धीरे-धीरे, बाकी शरीर को बिना हिलाये, पेट को श्वास के साथ अंदर-बाहर करने का अभ्यास कर लेना चाहिए ।

बायें नथुने से भस्त्रिका करने से इड़ा नाड़ी, दायें नथुने से करने पर पिंगला नाड़ी और दोनों से करने से सुषुम्ना नाड़ी प्रभावित होती है । बायें नथुने से करने पर चंद्रांग भस्त्रिका, दायें से सूर्यांग भस्त्रिका तथा दोनों के करने पर संपूर्ण भस्त्रिका होती है । चंद्रांग भस्त्रिका से मनुष्य को अपने विचार, इच्छा शक्ति तथा भावनाओं को शुद्ध एवं नियंत्रण करने में सहायता मिलती है।

सूर्यांग भस्त्रिका से प्राण तथा पौरुष को बलवान, शुद्ध एवं नियंत्रण करने में सहायता मिलती है। संपूर्ण भस्त्रिका से केंद्रीय स्नायुमंडल तथा मस्तिष्क बलवान होता है, बुद्धि एवं स्मरण शक्ति बढ़ती है । जुकाम, खांसी, दमा तथा अन्य फेफड़े के रोगों में यह बहुत लाभदायक है| फेफड़ों को शुद्धकर उन्हें शक्ति प्रदान करता है।

भस्त्रिका प्राणायाम करने के लाभ

भेस्त्रिका प्राणायाम को विधिपूर्वक करने से प्राणों में स्थिरता आती है, मन वश में होता है, निद्रा तथा आलस्य दूर होते हैं तथा ध्यान लगाने में आसानी हांती है।

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शीतली प्राणायाम

शीतली प्राणायाम करने की विधि:

पद्मासन में बैठें । शरीर ढीला हो । अपनी जिह्ना को पूरी तरह बाहर निकालकर उसकी नाली बना लें । जबान की नली से चेहरे को थोड़ा ऊपर उठाकर प्रयलपूर्वक लंबी-गहरी श्वास भरें। कुछ क्षण आंतरिक कुंभक करें और तीनों बंध लगाएं।

नाक के द्वारा धीरे-धीरे श्वास बाहर निकाल दें । इस प्रकार 5-6 बार करें । इस में ध्यान का केंद्र विशुद्ध -चक्र है।

शीतली प्राणायाम करने के लाभ

यह प्राणायाम ग्रीष्म ऋतु में गर्मी को शांत करने के लिए अत्यंत उपयोगी है। उच्च रक्तचाप तथा चर्मरोगों को ठीक करता है। रक्त को शुद्ध करता है । प्यास को बुझाता है। जिन व्यक्तियों का स्वभाव गर्म है, जल्दी क्रोध आता है, उनके लिए विशेष रूप से लाभकारी है।

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शीतकारी प्राणायाम

विधि

पद्मासन या सिद्धासन में बैठें । अपनी जिह्ला के अग्रभाग को तालू में लगाएं। दांतों तथा जबड़ों को भींचकर होठों के दायें-बायें से मुख से श्वास अंदर खींचें, जिससे सीत्कार की सी आवाज हो | फिर शीतली प्राणायाम की तरह ही आंतरिक कुंभक करें तथा बंध लगाएं। धीरे-धीरे आंतरिक कुंभक अधिक देर तक करने का अभ्यास करें।

शीतकारी प्राणायाम के लाभ

इसके लाभ शीतली प्राणायाम के लाभ की तरह ही हैं।यह गले के रोगों को ठीक करता है मुख के छालों को लाभ देता है। मुख की दुर्गंध तथा पायरिया आदि रोगों में नियमित करने से लाभ मिलता है । शरीर में ठंडक पहुंचाता है।

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सूर्यभेदी प्राणायाम

यह प्राणायाम भी है और कुंडलिनी शक्ति को जागृत करने का अभ्यास भी | सूर्य भेदन का मतलब है पिंगला नाड़ी का भेंदन करना अथवा उसे जागृत करना।

सूर्यभेदी प्राणायाम के लाभ

इससे मस्तिष्क का वह भाग जागृत होता है जिसमें पौरुष शक्ति रहती है, अर्थात्‌ है प्राण-शक्ति को जागृत करता तथा बढ़ाता है । यह शरीर में ताप पैदा करता है और रक्त का शोधन करता है।

इसके करने से रक्त में लाल कण अधिक मात्रा में बनते हैं । इसका गैयमित अभ्यास कुष्ठ रोग में लाभदायक है। यह मन को स्वस्थ करता है और इच्छा शक्ति को बढ़ाता है।

सूर्यभेदी प्राणायाम की विधि

पद्‌मासन में बैठें | दायें हाथ की बीच की दो अंगुलियों से बायीं नासिका को बंद करें फिर दायीं नासिकां से जल्दी से गहरी लंबी स्वास ले । अंगूठे से दायी नासिका को बंद कर लें ।

आंतरिक कुंभक में यथाशक्ति तीनों बंध भी लगाएं, फिर बंध खोलते हुए, पहले जालंधर और फिर मूल-बंध खोलकर, नासिका से जल्दी से श्वास को बाहर निकाल दें।

इस प्राणायाम में श्वास धीरे-धीरे नहीं लेने चाहिए। ऐसा पांच बार करें। आंतरिक कुंभक का अभ्यास बढ़ाएं ध्यान का केंद्र मणिपूर-चक्र रहेगा।

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उज्जायी प्राणायाम

हमारे गले की श्वास नलिका ही श्वास क्रिया का यंत्र है । कंठ में एक गांठ-सी दिखाई देती है, जिसे टेंटेवा कहते हैं, ठीक उसके पीछे, थोड़ा नीचे यह यंत्र होता है । यही विशुद्धि चक्र का स्थान भी है |

टेंटवा दबा देने से श्वास क्रिया रुक जाती है, इसे ही गला घोटना भी कहते हैं, जिससे मृत्यु हो जाती है। यह श्वास लेने का यंत्र हमारे नासिका द्वार तथा मुख द्वार दोनों से जुड़ा हुआ है ।

हम श्वास चाहे मुख से लें अथवा नासिका से, श्वास इसी नलिका द्वारा ही फेफड़ों में पहुंचती है । इसी अंग को कुछ संकुचित करके श्वास भरने से एक प्रकार की आवाज होती है, जिसे साधारण भाषा में खर्राटे कहते हैं । सोते समय बहुत से लोग इसी प्रकार श्वास – प्रश्वास लिया करते हैं।

उज्जायी प्राणायाम की विधि

ज्ञान मुद्रा की स्थिति में बैठें, जिह्वा के अग्र भाग को उलट कर तालू से लगाएं । पेट को थोड़ा अंदर पिचका कर कंठ को दबाएं, हल्की खर्राटे की आवाज में लंबा-गहरा श्वास लें तथा छोड़ें । इसे 8-0 बार करें|

श्वास गले से हृदय तक लेनी है और हृदय से गले तक छोड़नी है। श्वास की गति एक समान व बहुत धीमी थोड़ी देर बाद इकट्ठी हुई लार निगल लेनी चाहिए, ताकि गले में खुश्की न रहे। ध्यान विशुद्धिचक्र पर।

उज्जायी प्राणायाम के लाभ

मिर्गी तथा अन्य दिमागी रोगों के लिए उज्जायी प्राणायाम अत्यंत गुणकारी है। इससे टांसिल का रोग दूर होता है और सर्दी, जुकाम, खांसी से पीड़ित लोगों को राहत मिलती है। गले, नाक व कान के समस्त रोग ठीक होते हैं । आवाज में मधुरता आती है। संगीत सीखने वालों के लिए यह अति लाभकारी है।

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भ्रामरी प्राणायाम

भ्रामरी शब्द भ्रमर अर्थात भौरे से लिया गया है । इस प्राणायाम में भौरे के समान गुंजन करते हुए रेचक किया जाता है।

भ्रामरी प्राणायाम की विधि

ज्ञान मुद्रा की स्थिति में बैठकर श्वास को शांत करें । दोनों हाथ के अंगूठों से दोनों कान बंद कर लें। दोनों हाथों की ऊपर की दो अंगुलियां आंखों पर और नीचे की होठों पर स्थिर करें |

हथेली खुली और कोहनियां उठी हुईं। लंबा गहरा श्वास भरें | कुछ क्षण रुकते हुए, भ्रमर की आवाज करते हुए धीरे-धीरे रेचक करें। इस प्रकार 5-7 बार करें। धीरे-धीरे इसका अभ्यास बढ़ा सकते हैं। ध्यान देने की बात यह है कि गुंजन की लय नहीं टूटनी चाहिए। ध्यान आज्ञा-चक्र पर।

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भ्रामरी प्राणायाम के लाभ

सही अर्थों में भ्रामरी प्राणायाम एक आध्यात्मिक अभ्यास है। इसके अभ्यास से नाद ब्रह्म की सिद्धि होती है । शारीरिक दृष्टि से भी इसके अनेक लाभ हैं ।

यह सभी प्रकार की मानसिक उत्तेजना अथवा उदासीनता की अवस्थाओं में लाभकारी है। विकृत बुद्धि या चंचल मन वालों के लिए यह अत्यंत उपयोगी है ।

यह प्राणायाम मस्तिष्क के स्रायुओं की सुखद एवं स्वस्थ रूप से मालिश करता है। इससे नाड़ीसंस्थान तथा मन शांत होता है। आज्ञाचक्र जागृत करने में यह सहायक है।

नाड़ीशोधन प्राणायाम

यह प्राणायाम नाड़ियों अर्थात स्नायुमंडल की शुद्धि के लिए किया जाता है । यह बड़ा ही सरल प्राणायाम है और बहुत उपयोगी भी । मन को एकाग्र कर आप इसके क्रम को बढ़ाएं।

अनुलोम-विलोम

नाड़ीशोधन की पहली अवस्था अनुलोम-विलोम है। पद्मासन में बैठें । बायीं नासिका से श्वास भरें और दायीं से छोड़े, फिर दायीं से भरें और बायीं से छोड़ें। अनुलोम-विलोम प्राणायाम

इसी प्रकार 5-7 मिनट इसका अभ्यास करें। प्रयास करें कि जितना समय श्वास लेने में लगे, उतना ही समय श्वास छोड़ने में भी लगे और लय भी एक जैसी हो। इसका अभ्यास हो जाने के बाद रेचक का समय दोगुना कर दें।

रोगी तथा दुर्बल व्यक्ति इस प्राणायाम से विशेष लाभ ले सकते हैं । हृदय तथा श्वास रोगियों के लिए यह अति उत्तम प्राणायाम है जिससे मन शांत तथा नाड़ियां शुद्ध होती हैं।

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नाड़ीशोधन प्राणायाम की विधि

सिद्धासन, पद्मासन या सुखासन में बैठ जाएं । श्वास को शांत करें । दायें हाथ की दोनों पहली अंगुलियों को मोड़ते हुए दायीं नासिका को अंगूठे से बंद कर लें और श्वास को बायीं नासिका से भरें । चौथी एवं पांचंवीं अंगुली से बायीं नासिका को बंद कर लें और क्षण आंतरिक कुंभक करें। अंगूठे को हटाकर दायीं नासिका से धीरे-धीरे श्वास दें ।फिर दायीं नासिका से श्वास लें । दोनों नासिकाएं बंद करें । फिर बायीं नासिका में श्वास बाहर निकाल दें। यह नाड़ीशोधन प्राणायाम की एक आवृत्ति हुई।

इसे तीन-चार बार प्रतिदिन करते हुए अभ्यास को बढ़ाएं। उतनी देर श्वास रोकना है, जितनी देर आप आराम से रोक सकें और जब सांस छोड़ें, तो छोड़ने की गति धीमी हो।

जब आपका यह अभ्यास पक्का हो जाए तो श्वास का क्रम बना लें। यदि श्वास लेने 4 सेकेंड लगें, तो 8 सेकेंड तक श्वास रोकें और 8 सेकेंड में ही श्वास को बाहर निकालें । यानि एक, दो और दो (१:२:2) का अनुपात। इस अनुपात को 1: 4: 2 तक बढ़ाएं।
बस रोकने में शक्ति नहीं लगानी है।

नाड़ीशोधन प्राणायाम में विशेष ध्यान देने योग्य बातें हैं पूरक, कुंभक और रेचक की क्रियाओ में एक विशेष अनुपात का होना तथा रेचक करते समय नासिका से अधिक दूरी पर स्वास का अनुभव न होना।

पूरक तथा रेचक का अर्थ केवल श्वास लेना अथवा छोड़ना नहीं है। योग की भाषा में साधारण श्वास लेने व छोड़ने को श्वास-प्रश्वास कहते हैं। परंतु प्राणायाम में पूरक और रेचक शब्दों का प्रयोग किया जाता है, जिनका अर्थ है प्रयत्नपूर्वक व सावधानी से धीरे-धीरे श्वास भरना तथा छोड़ना । कुंभ का अर्थ है घड़ा अर्थात्‌ श्वास को घड़े में भरकर रखने के समान रोकना कुंभक हुआ।

आंतरिक कुंभक में जब हम श्वास रोकते हैं, तो अपने फेफड़ों को बढ़ाते या फुलाते हैं तथा उनमें शुद्ध हवा भरते हैं। फेफड़ों के छोटे-छोटे छिद्र एवं स्रायु शुद्ध होते हैं और उन्हें बल मिलता है । बाह्य कुंभक में जब श्वास बाहर रोकते हैं, तो फेफड़ों के ख्रायु सिकुड़ जाते हैं और उनमें से अशुद्ध हवा पूरी तरह बाहर निकल जाती है, जिससे सारा शरीर शुद्ध, निर्मल तथा हल्का हो जाता है और दीर्घायु प्राप्त होती है।

साधारणत: हम तुरंत श्वास लेकर छोड़ देते हैं । इस प्रकार शुद्ध वायु का उपयोग पूरी तरह से शरीर में नहीं हो पाता। कुंभक को ठीक प्रकार से सिद्ध कर लेने की महिमा अवर्णनीय है | सभी जानते हैं कि हम जब भी कोई काम शक्ति के द्वारा करते हैं, तो श्वास रोककर ही करते हैं । किसी प्रकार का बोझ उठाना, परिश्रम का काम करना, गोला फेंकना, राइफल चलाना आदि सभी कार्य कुछ क्षण के लिए ही क्यों न हों ,श्वास रोककर ही किये जाते हैं। कुंभक के द्वारा हम अपने शरीर की शक्ति की क्षमता बढ़ा सकते हैं।

सरल होने के बावजूद कुंभक कठिन क्रिया नहीं है, क्योंकि इसमें केवल श्वास रोकना ही होता है। यह क्रिया असाधारण शक्ति देने वाली है । अनुपात से अधिक कुंभक करना, बिना पहले के अभ्यास को पक्का किये आगे की क्रिया करना या ठीक व नियमित रूप से कुंभक न करना लाभ नहीं देता। अत: अपना अभ्यास सावधानी पूर्वक, धीरे-धीरे व नियमित रूप से बढ़ाना चाहिए ताकि लाभ हो, हानि न हो।

नाड़ीशोधन प्राणायाम एक उत्तम प्राणायाम है ।यह स्तायविक बीमारियों, फेफड़ों के रोगों, हृदय की घबराहट या दुर्बलता आदि में विशेष लाभदायक है। जिस व्यक्ति को रक्तचाप (Blood Presure) का रोग हो, उसे कुंभक नहीं करना चाहिए। वह केवल पूरक और रेचक का अभ्यास करे। धीरे-धीरे रोग ठीक होने पर कुंभक का थोड़ा-थोड़ा अभ्यास करे। नाड़ीशोधन प्राणायाम में ध्यान का केंद्र अनाहत चक्र होता है।

ऊपर बताये गये प्राणायाम(Pranayama Yoga Benefits in Hindi) के अनेक प्रकारों का प्रतिदिन एक साथ अभ्यास करने की आवश्यकता नहीं । प्राणायाम का अभ्यास किसी जानकार से सीखकर ही करें ।इसके गलत या आवश्यकता से अधिक करने से हानि का डर रंहता है। अपनी शारीरिक सामर्थ्य के अनुसार अपने अनुकूल प्राणायाम का चुनावकर धीरे-धीरे अभ्यास बढ़ाना चाहिए। साधारणतया स्वस्थ रहने के लिए प्रतिदिन 10-15 मिनट के लिए नाड़ीशोधन, उज्जायी तथा ऋतु के अनुसार कपालभाति, भस्त्रिका, शीतली प्राणायाम का अभ्यास श्रेयस्कर है।

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