हस्त-पाद लोपासन

हस्त-पाद लोपासन क्‍या है?

इस आसन की स्थिति में हाथ और पैर के पंजे दिखाई नहीं पड़ते, इसलिये इसे “हस्त-पाद लोपासन’ की संज्ञा दी गयी है। कुछ योगी इसे “हस्त-पाद-लुप्तासन’ भी कहते हैं।

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हस्त-पाद लोपासन के रोग निदान और लाभ

यह मुख्यतः साधकों और योगियों का ही आसन है। मूलाधार से उठती हुई शक्ति और वायु सीधी सहस्त्रार चक्र तक गंति करती है। पैर की उंगलियों, जांघों तथा भुजाओ को क्षमता प्रदान करता है।

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हस्त-पाद लोपासन की विधि

हस्त-पाद लोपासन

शालाओं में शिक्षकों द्वारा दण्डस्वरूप कराया जाने वाला ‘घुटना-टेक’ की स्थिति में बैठकर दौनों घुटनों के बीच लगभग दो फुट का अन्तर बनायें। दोनों पैरों एड़ियां और अंगूठे आपस में मिले हुए हों।

पैरों की उंगलियां सामने पैरों की ओर मुड़ी हुई तथा पैर के तलुबे लम्ब आकार में उठे हे । दोनों हाथों की हथेलियां | एडियों पर रखकर उन पर नितम्ब जमाकर बैठना चाहिये।

कमर का ऊपरी भाग सीधा ऊपर को उठा हुआ तथा हाथों-पैरों में तनाव बना रहना चाहिये। श्वास पर ध्यान केन्द्रित कर उसे भीतर जाते और बाहर आते देखें। इस स्थिति में दस से बीस मिनट तक रहें। अप

भरपूर श्वास अन्दर भरकर पेट तथा सीने में रोक लें। गर्दन सामने को झुकाकर कण्ठ पर दबाव बनायें। मूलाधार (मल-मूत्र द्वार के बीच की सीवन) को अंदर की ओर संकुचित कर, जब तक श्वास अन्दर रोक सकें, रोके रखिये। बाद में बहुत धीरे-धीरे ही श्वास को छोड़ना चाहिये।

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विशेष

चित्रानुसार पैरो के पंजे और घुटने जमीन पर टेककर अपने दोनों हाथों से नितम्बों के नीचे एड़ियों के ऊपर रखकर दबायें। पैर के तलुबे लम्बाकर उठे होने चाहियें। दोनों घुटनों के मध्य कम-से-कम दो फूट का अन्तर आवश्यक है।

साधक की कमर बिल्कुल सीधी होनी चाहिये। दृष्टि को एकाग्र सामने की ओर रखें। शरीर की सोई हुई मूलाधार शक्तियों को सहस्त्रार की ओर उठता हुआ अनुभव कीजिये। यही प्रयास बार-बार तब तक कीजिये जब तक कि मलद्वार हे समीप से विद्युत-तरंग की एक लहर-सी मस्तिष्क की ओर उठती हुई प्रतीत न होने लगे।

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