अष्टांग योग | Ashtanga Yoga in Hindi

अष्टांग योग | Ashtanga Yoga in Hindi

अष्टांग योग( Ashtanga Yoga in Hindi)-मानव जीवन का लक्ष्य सांसारिक कष्टों से मुक्त होकर शाश्वत एवं चिरंतन आनंद की प्राप्ति है। सांसारिक विषय वासनाओं के मोह में पड़कर प्राणी क्लेश, अभाव आदि का अनुभव करता है। इनसे छुटकारा पाने के लिए नाना प्रकार के साधनों को अपनाकर उस परम-आनंद या परम-तत्व की प्राप्ति का प्रयास करता है। कर्म, उपासना, ज्ञान, योग आदि विभिन्‍न पद्धतियां इसी ध्येय सिद्धि की साधनाएं हैं । मनुष्य का अंतिम लक्ष्य पुनर्जन्म नहीं, बल्कि ज्ञान और कैवल्य के माध्यम से परमानंद की अनुभूति है। इस अनुभूति के साधनों में योग मार्ग एक अन्यतम साधन है।अष्टांग योग

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योग शब्द ‘युज्‌’ धातु से बना है। इसका अर्थ है, मिलाप या जोड़ना। आत्मा और परमात्मा के सम्मिलन की अद्वैतानु भूति ही योग है । योग मार्ग द्वारा समाधि अवस्था में पहुंचने का प्रयास किया जाता है | यह प्रयास बैराग्य तंथा अभ्यास द्वारा चित्तवृत्तियों की एकाग्रता से संभव होता है। एकाग्रता, चित्तवृत्तियों के निरोध से संभव होती है। ‘योगश्चित्तवृत्ति निरोध:’ अर्थात्‌ चित्त की वृत्तियों क़ा बाहरी संसार के विषयों में न भटकना और शांत हो जाना ही निरोध है| समाधि इस चित्तवृत्ति की निरोध की पूर्णावस्था है । यही योग है।

श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार, योगानुष्ठान में चित्त जहां रम जाता है, वहां परमात्मा को देखकर आत्मा की संतुष्टि होती है। इस स्थिति में, अगोचर सुख की अनुभूति होती है | यहां न इंद्रियां होती हैं, न ही विषय इसमें मन डिगता नहीं है, कोई वस्तु उसे आकर्षित नहीं कर पाती। मन की वह स्थिति योग है, जहां बड़े-से-बड़े दुख में भी मन विचलित नहीं होता। इसीलिए शांतचित्त, निष्याप, ब्रह्मभूत तथा कर्मबंधन से मुक्त योगी वास्तविक आनंद की उपलब्धि करता है।

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शास्त्रों में चित्त की मूढ़, क्षिप्त, निक्षिप्त, एकाग्र और निरुद्ध ये पांच अवस्थाएं बतायी गयी हैं। काम, क्रोध, लोभ व मोह से मूढ़ावस्था उत्पन्न होती है | निद्रा, तंद्रा, भय, मोह, आलस्य, दीनता आदि इसके लक्षण हैं। रजोगुणप्रधान क्षिप्त अवस्था का कारण रागद्वेष है और लक्षण धर्म-अधर्म, राग-विराग, ज्ञान-विज्ञान, ऐश्वर्य-अनैश्वर्य आदि की प्रवृत्ति है।

कर्मयोग के कारण सत्वगुण की प्रधानता होने से धर्म, ज्ञान, ऐश्वर्य की प्रवृत्ति होकर सुख, प्रसन्नता, क्षमा, श्रद्धा, धैर्य, चेतना, दया आदि गुणों से चित्त की निक्षिप्त अवस्था प्राप्त होती है । सतोगुण की प्रधानता होने से चित्त में एकाग्रता आती है ।इस स्थिति में परमाणु से महांतत्व (महत्तत्त्व)तक सभी विषयों का साक्षात्कार होने लग जाता है । यह ‘विवेक- प्राप्ति’ की अबस्था है। निरुद्ध अवस्था में चित्त और पुरुष (विशुद्ध चेतन) के स्वरूप के पूर्ण ज्ञान के साथ ‘ पर बैराग्य ‘ होता है ।चित्त आत्मस्वरूप में स्थित हो जाता है और अविद्या का नाश हो जाता है इसे ‘निर्बीज समाधि’ कहते हैं । पौधे या वृक्ष का मूल तो बीज ही है, जब वही नष्ट हो गया, तो पौधे व वृक्ष की संभावना भी जाती रही । जीवात्मा के संदर्भ में बीज हैं विकार व अज्ञान, जब ये ही नष्ट हो गये, तो भवचक्र भी समाप्त। इस प्रकार के आचरण से दृष्टा की अपने स्वरूप में अवस्थिति हो जाती है और बह सबमें परमात्मा को देखने लगता है। यही समन्वय या एकता बुद्धियोग है।

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वैसे तो योग में जीवन के सिद्धांत और व्यवहार दोनों ही पक्षों की महत्ता विद्यमान है किंतु क्रियात्मक पक्ष पर इसमें अधिक जोर दिया गया है । प्रत्येक अभ्यासी को सत्यता का अनुभव योगाभ्यास करते समय स्वयं होता है । संसार में दुख का कारण यह हैं कि मनुष्य अपने एक साथी-प्रकृति या माया-से संबंध बनाये हुए है, परंतु दूसरे साथी परमात्मा की ओर उसका ध्यान नहीं जाता। उसका संबंध परमात्मा से भी बन जाए, तो उसका कल्याण हो जाए। इस संबंध को स्थापित करने के लिए ही योग का आश्रय लिया जाता है| योग शरीर, मन और चेतना इन तीनों के विकास का समंन्वित साधन है। इसका उद्देश्य है कि मानव इन तीनों से संबंधित क्षमताओं का संपूर्ण रूप से विकास करें क्योंकि इनके बिना
आत्मजञ्ञॉनं की बात ही की जा सकती है, व्यवहार में ऐसा हो पाना कतई असंभव है। शरीर ही सभी प्रकार के धर्मों के आचरण का मुख्य साधन है। योग में शरीर की साधना के साथ मोक्ष की साधना भी अनवरत.रूप से चलती रहती है। शरीर-साधना के संदर्भ में योग के
अनेक अंगों का वर्णन योग ग्रंथों में किया गया है।

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हमारे ऋषि-मुनियों ने योग के द्वारा शरीर, मन और प्राण की शुद्धि तथा परमात्मा की प्राप्ति के लिए आठ प्रकार के साधन बताये हैं, जिसे ‘अष्टांग योग’ कहते हैं । अष्टांग योग के ये आठ अंग हैं — यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, ध्यान, धारणा और समाधि | इनमें पहले पांच साधनों का संबंध मुख्य रूप से स्थूल शरीर से है । ये सूक्ष्म से स्पर्श मात्र करते हैं, जबकि बाद के तीनों साधन सूक्ष्म और कारण शरीर का गहरे तक स्पर्श करते हुए उसमें परिष्कार करते हैं । इसीलिए पहले साधनों –यम, नियम, आसन, प्राणायाम व प्रत्याहार को बहिरंग साधन और धारणा, ध्यान-तथा समाधि को अंतरंग साधन कहा गया है। अब हम यहां अष्टांग योग के ये आठ अंग की एक-एक करके चर्चा करेंगे, कुछ की सामान्य और कुछ की विशेष रूप में।

अष्टांग योग (Ashtanga Yoga in Hindi ) के आठ अंग ये है-

1.यम

अष्टांग योग में यम का अर्थ है चित्त को धर्म में स्थित रखने के साधन। ये पांच हैं:

1. अहिंसा:-

मन, वचन व कर्म द्वारा किसी भी प्राणी को किसी तरह का कष्ट न पहुंचने की भावना अहिंसा है। दूसरे शब्दों में, प्राणिमात्र से प्रेम अहिंसा है।

2. सत्य:-

जैसा मन ने समझा, आंखों ने देखा तथा कानों ने सुना, वैसा ही कह देना सत्य है। लेकिन सत्य केवल बाहरी नहीं, आंतरिक भी होना चाहिए।

3. अस्तेय:-

मन, वचन, कर्म से चोरी न करना, दूसरे के धन का लालच न करना और दूसरे के सत्व का ग्रहण न करना अस्तेय है।

4. ब्रह्मचर्य :-

अन्य समस्त इंद्रियों सहित गुप्तेंद्रियों का संयम करना–खासकर मन, वाणी और शरीर से यौनिक सुख प्राप्त न करना–ब्रह्मचर्य है।

5. अपरिग्रह:-

अनायास प्राप्त हुए सुख के साधनों का त्याग अपरिग्रह है। अस्तेय में चोरी का त्याग, किंतु दान को ग्रहण किया जाता है। परंतु अपरिग्रह में दान को भी अस्वीकार किया जाता है । स्वार्थ के लिए धन, संपत्ति तथा भोग सामग्रियों का संचय परिग्रह है और ऐसा न करना अपरिग्रह।

“उपरोक्त पांचों साधन व्यक्ति की नैतिकता और उसके विकास, उसकी स्थिरता (टिकाव) से तो जुड़े हुए हैं ही, समाज के संदर्भ में भी अपनी महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं, विशेषकर तब, जब विकास और उन्नति भौतिकता की धुरी पर धूम रही हो, अर्थात्‌ आज के समय में।

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2.नियम

नियम भी पांच प्रकार के हैं, जो निज से संबंधित हैं। ये हैं :

1. शौच:-

शरीर एवं मन की पवित्रता शौच है। शरीर को स्नान, सात्विक भोजन, घट्क्रिया आदि से शुद्ध रखा जा सकता है । मन की अंतःशुद्धि, राग, द्वेष आदि को त्यागकर मन की वृत्तियों को निर्मल करने से होती है।

2. संतोष:-

अपने कर्तव्य का पालन करते हुए जो प्राप्त हो उसी से संतुष्ट रहना या परमात्मा की कृपा से जो मिल जाए उसे ही प्रसनततापूर्वक स्वीकार करना संतोष है।

3. तपः-

सुख-दुख, सर्दी-गर्मी, भूख-प्यास आदि इंद्वों को सहन करते हुए मन और शरीर को साधना तप है।

4. स्वाध्याय:-

विचार शुद्धि और ज्ञान प्राप्ति के लिए विद्याभ्यास, धर्मशास्त्रों का अध्ययन, सत्संग और विचारों का आदान-प्रदान स्वाध्याय है।

5. ईश्वर प्रणिधानः

मत्त, वाणी, कर्म से ईश्वर की भक्ति और उसके नाम, रूप, गुण, लीला आदि का श्रवण, कीर्तत, मनन और समस्त कर्मों छा श्वरार्पण ‘ईश्वर प्रणिधान’ है।

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3.आसन

उच्च प्रकार की शक्ति प्राप्त होने तक नित्यप्रति शारीरिक और मानसिक आसन करने पड़ते हैं । योगियों ने इस प्रकार के आसन, प्राणायाम आदि का वर्णन किया है, जिनके करने से शरीर एवं मन पर संयम होता है। ‘स्थिरम्‌ सुखमासनम्‌! (यो. सू.), अर्थात्‌ जिसमें शरीर स्थिर रहे और मन को सुख प्राप्त हो, उस स्थिति को आसन कहते हैं । लौकिक कार्यों में शरीर को अधिक कसने का नाम प्रयत्न है। इन कार्यों में शरीर को अधिक न थकाना, प्रयत्न की शिथिलता, यानी सामान्य निवृत्ति, विश्राम, शरीर को सामान्य आराम देने के कारण और परंमात्मा का ध्यान करने से आसन की सिंद्धि होती है।अष्टांग योग

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आसन की सिद्धि से नाड़ियों की शुद्धि, आरोग्य की वृद्धि एवं शरीर व मन को स्फूर्ति प्राप्त होती है | उद्देश्यों के भेद के कारण ये आसन दो श्रेणियों में आते हैं; एक जिनका उद्देश्य प्राणायाम या ध्यान का अभ्यास है और दूसरे वे जो कि शरीर को निरोग बनाये रखने के लिए किये जाते हैं । क्योंकि शरीर और मन का संबंध स्थूल और सूक्ष्म का है इसलिए इन दोनों ही श्रेणियों को एक-दूसरे से अलग-अलग करके नहीं देखा जा सकता। दूसरे शब्दों में, प्राणायाम और ध्यान का अधिकारी तो वही है, जिसने शरीर का पूरी तरह से शोधन कर लियां हो, और यह शोधन बिना आसनों के संभव नहीं है। स्थिर और सहज बैठने के लिए जो शक्ति और धैर्य चाहिए वह भी आसनों से ही मिलता है।

4.प्राणायाम

प्राणायाम के संबंध में विशेष व्याख्या प्राणायाम प्रकरण में की गयी है, इसलिए यहां उसका संक्षेप में ही उल्लेख किया जा रहा है।

श्वासप्रश्वासयो: गतिविच्छेद: प्राणायाम: (यो. यू: 2/49) यानी प्राण की स्वाभाविक गति ‘ श्वास-प्रश्वास ‘ को रोकना प्राणायाम है ।यह व्याख्या योग सूत्रकार महर्षि पंतजलि द्वारा की गई है।वे इसका फल बताते हुए लिखते हैं कि प्राणायाम से पाप संस्कार आदि दोष एवं इंद्रियों की विषयासक्ति निवृत्ति होने से ज्ञान का प्रकाश होता है ।

ततः क्षीयते प्रकाशावरणम्‌’ (योग दर्शन 252) ज्ञान के ढकने वाले अज्ञान का नाश होता है। धारणासु च योग्यता मनस; (के छू 259) मन धारणा के योग्य होता है। मनु भगवान ने भी “प्राणायामैर्दहित्‌ की कय जैसे विधान से प्राणायाम के द्वारा दोष के दहन पर जोर दिया
है | प्राणायाम के से सुषुम्ना नाड़ी प्रभावित होती है और नाड़ी चक्रों में चेतना आती है। इससे अनेक प्रकार की सिद्धियां प्राप्त होती हैं। जिन्हें लोग चमत्कार कहते हैं|

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योगी इन सिद्धियों को रोग कहते हैं, क्योंकि ये साधक को ‘स्व’ में स्थित नहीं रहने देतीं, ये साधक को अपने में उलझाकर उसे उसके मुख्य लक्ष्य से मोड़ देती हैं इसलिए ये सिद्धियां बाधक हैं, साधक नहीं । हां सहजरूप में प्राप्त सिद्धियों का प्रयोग ‘ सिद्ध पुरुष ‘ लोगों की अलौकिक में आस्था जगाने के लिए जरूर करते हैं ।इससे अलौकिक योग मार्ग के प्रति जहां लोगों का रुझान बनता है, वहीं निराश साधक को यह प्रेरणा भी मिलती है कि इंद्रियों से परे भी कुछ है, और जो इंद्रियों से परे है, वही असल में सत्य है।

5.प्रत्याहार

जबइंद्रियां अपने बाह्य विषयों से मुड़कर अंतर्मुखी होती हैं, उस अवस्था को प्रत्याहार कहते हैं ।सामान्यत : इंद्रियों की स्वेच्छाचारिता प्रबल होती है । प्रत्याहार की सिद्धि से साधक को इंद्रियों पर अधिकार, मन की निर्मलता, तप की वृद्धि, दीनता का क्षय, शारीरिक आरोग्य
एवं समाधि में प्रवेश करने की क्षमता प्राप्त होती है।

यम, नियम, आसन, प्राणायाम के अभ्यास से साधक का शरीर शुद्ध और स्वस्थ हो जाता है, मन और इंद्रियां शांत हो जाती हैं, उनमें एकाग्रता आ जाती है | प्रभु की असीम शक्ति का आभास होता है और साधक अपने को प्रभु में लीन रखने लगता है | इस प्रकार इस अभ्यास से प्रत्याहार के लिए सुदृढ़ भूमिका तैयार हो जाती है।

पातंजलि योग सूत्र के अनुसार, बाह्य स्थूल ज्ञानेंद्रियों तथा कर्मेंद्रियों का मन और बुद्धि के साथ सीधा संपर्क इस प्रकार होता है; .

स्थूल विषयों के ज्ञान को लेकर स्थूल इंद्रियां कपालगत ज्योतिर्मय सूक्ष्म इंद्रियों को और सूक्ष्म इंद्रियां इसे मन को देती हैं। मन बुद्धि को समर्पित करता है, बुद्धि इन समस्त विषयों का निर्णय करके, इसे सूक्ष्म बनाकर, नीचे हृदय में स्थित कारण शरीर के अंगभूत चित्त को संस्कारों के रूप में भेजती जाती है। चित्त इन संस्कारों का संग्रह करता जाता है। इस.क्रम-परंपरा में स्थूलेंद्रियों का साक्षात्‌ संपर्क मन-बुद्धि के साथ होता रहता है। चित्त तक इंद्रियों की पहुंच नहीं होती एवं निदिध्यासन आदि के समय भी केवल सूक्ष्मेंद्रियों के साथ ही मन-बुद्धि का व्यापार होता है। बाह्य इंद्रियों पर इसंका प्रभाव न पड़ने से उसमें किसी प्रकार की क्रिया नहीं होती । इसका परिणाम यह होता है कि खुले होने पर भी नेत्र सामने उपस्थित रूप को नहीं देख पाते, कान सुनते नहीं, हाथ हिलते नहीं, पैर चलने में असमर्थ हो जाते हैं । तब चित्त आत्मचिंतन में व्यस्त हो जाता है अथवा निरुद्ध होकर शांत हो जाता है। फलत: मन-बुद्धि भी शांत हो जाते हैं । तब इंद्रियां भी अपने स्वामियों को शांत
पाकर स्वयं भी उनकी स्थिरता का अनुकरण करती हुई आहार रूप विषयों को ग्रहण नहीं कर पार्ती | इस प्रकार इंद्रियों का अपने आहार रूपी विंषयों के साथ संबंध न जोड़ना* (ज्ञानेंद्रियों का अपने-अपने ज्ञान को ग्रहण न करना तथा कर्मेंद्रियों का अपने कर्म व्यापारों से निवृत्त हो जाना) तथा शांत मन और शांत बुद्धि के समान शांत हो जाना प्रत्याहार है। उपरोक्त बाह्य स्थूल इंद्रियों के व्यापार को ध्यान में रखते हुए योगदर्शनकार ने प्रत्याहार की गणना भी यम, नियम, आसन, प्राणायाम की तरह योग के बहिरंग साधनों में की।

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6. धारणा

स्थूल वा सूक्ष्म किसी भी विषय में अर्थात्‌ हृदय, भूकुटि, जिह्वा, नासिका आदि आध्यात्मिक प्रदेश तथा इष्ट देवता की मूर्ति आदि बाह्य विषयों में चित्त को लगा देने को धारणा कहते हैं । यम, नियम, आसन, प्राणायाम आदि के उचित अभ्यास के पश्चात्‌ यह कार्य सरलता से होता है। प्राणायाम से प्राण वायु और प्रत्याहार से इंद्रियों के वश में होने से चित्त में विक्षेप नहीं रहता, फलस्वरूप शांत चित्त किसी एक लक्ष्य पर सफलतापूर्वक लगाया जा सकता है । विक्षिप्त चित्त वाले साधक का उपरोक्त धारणा में स्थित होना बहुत कठिन है। जिन्हें धारणा के अभ्यास का बल बढ़ाना है, उन्हें आहार-विहार बहुत ही नियमित करना चाहिए तथा नित्य नियमपूर्वक श्रद्धा सहित साधना व अभ्यास करना
चाहिए।

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7. ध्यान

ध्यान का तात्पर्य है, वर्तमान में जीना । वर्तमान में जीकर ही मन की चंचलता को समाप्त किया जा सकता है, एकाग्रता लायी जा सकती है। इसी से मानसिक शक्ति के सारे भंडार खुलते हैं । उसी के लिए ही ध्यान की अनेक विधियां हैं।

8.समाधि

विक्षेप हटाकर चित्त का एकाग्र होना ही समाधि है| ध्यान में जब चित्त ध्यानाक़ार को छोड़कर केवल ध्येय वस्तु के आकार को ग्रहण करता है, तब उसे समाधि कहते हैं अर्थात्‌ इस स्थिति में ध्यान करने वाला ध्याता भी नहीं रहता, वह अप्रने-आपको भूल जाता है, रह जाता है मात्र ध्येय, यही ध्यान की परमस्थिति है। यही समाधि है । समाधि ध्यान की चरम परिणति है । जब ध्यान की पक्वावस्था होती है, तब चित्त से ध्येय का द्वैत और तत्संबंधी वृत्ति का भान चला जाता है।

धारणा, ध्यान और समाधि इन तीनों के समुदाय को योगशास्त्र में संयम कहा गया है। अनुभवी साधकों का कहना है कि परिपक्वावस्था में केवल ध्येय में ही शुद्ध सात्विक प्रवाहरूप से बुद्धि स्थिर होती है, उसमें प्रज्ञालोक और ज्ञान ज्योति का उदय हो जाता है।

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